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Thursday, 25 June 2026

समाज और हम

 ✍️✍️समाज में नाम पाने की चाह ,अपने परिवार से दूर रहकर औरों के साथ मशगूल रहना क्या आपको दुनिया की नजरों में अच्छा साबित कर सकता है । राजनीति का काम उन्हीं लोगों का हो सकता है जिनके पेट भरे हुए हैं वरना मध्यमवर्गीय इंसान को अपने परिवार के पालन पोषण से ही समय निकालना बहुत मुश्किल है ।आप समाज सेवा भी बिना पैसों के कब तक कर सकते हैं क्योंकि उसके लिए भी आर्थिक रूप से सुदृढ़ होना जरूरी है । फिर क्यों आज औरों की देखा देखी अपने परिवार की चिंता किये बिना सो कॉल्ड समाज सेवा में लगे रहते हैं ? क्या जरूरत के समय आपके कोई एक भी काम आ सकता है ? नहीं न क्योंकि आज मतलब की दुनिया है ,आप अपने एक छोटे से काम की भी किसी से कहकर देखो कोई साथ नहीं आएगा ।फिर क्यों और कैसी समाज सेवा? आपका अपना परिवार रोता रहे और आप सिर्फ अपने बारे ही सोचें ,ये कैसी सोच है आज के युवाओं की ? यदि आपमें अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारी का भाव नहीं ,समाज से या खुद के हालत से लड़ने का जज्बा नहीं तो आप कायर हैं । जीवन किसी का भी आसान नहीं ,जिंदगी में बहुत उतार चढ़ाव आते हैं इसका मतलब ये तो नहीं कि आप अपनी जिम्मेदारियों से मुँह छिपाकर भाग लें ? 

वर्ष वार्ष्णेय अलीगढ़ 

Versha Varshney

Tuesday, 8 August 2023

नेह

छू गयी दिल को मेरे तेरी
 यही दिल लुभाने की अदाएं ,
कितना नेह है भरा दिल में तेरे ,
क्या सच में मैं इतनी ही मीठी हूँ या
 फिर ये सिर्फ एक वहम है मीठा सा ।
गर ये सच है तो क्यों दुखाते हो दिल मेरा ।
क्या मेरे दुःख से तुम्हें
 तनिक भी पीर नहीं होती ।
हाँ छूना चाहती थी मैं भी 
आस्मां जैसे दिल को तेरे ,
भागना चाहती थी मैं भी
 कभी तेरी हंसी के साथ
शायद कुछ तो कमी थी
 मेरी आराधना में ,
जो अधूरी ही रही मेरी पूजा 
पत्थर थे तुम ,
पाषाण ही तो थे जो कभी
समझ ही न पाए मेरी व्यथा को ।
कोई गम नहीं ,ये तो प्रकृति है तुम्हारी ,
कभी तो नम हो ही जाएंगी आँखें तुम्हारी ,
जब अंधेरों में कोई दीप झिलमिलायेगा ।
झलक मेरी पाकर एक बूंद पानी की आँखों से निकल कर जब पूछेगी ,
बताओ न क्या गलती थी मेरी ,
जो फेंक दिया तुमने मुझे
 बारिश की एक बूंद समझकर|
मैं मात्र एक बूंद ही तो नहीं थी,
'वर्षा 'हूँ आज भी सिर्फ तुम्हारी ।।







Friday, 30 July 2021

आँसू

न जाने क्यों एक पल में ही आ जाते हैं ये आँसू 
न उम्र देखते हैं न जगह बस आँखों को भिगो जाते हैं ये आँसू 

खुशी का माहौल हो या फिर गमगीन नजारा 
बादलों की तरह अचानक बरस जाते हैं ये आँसू

किसी को लगते हैं सच्चे तो किसी को घड़ियाली नजर आते 
दिल का बोझ झट से हल्का कर जाते हैं आँसू

ममत्व का प्रतीक भी हैं तो दुःख का गहरा सागर भी 
उम्मीदों के सागर में अक्सर डुबकी लगा जाते हैं आँसू 




Sunday, 24 January 2021

 174.

#ईश्वर के न्याय पर कभी संदेह नहीं करना चाहिए क्योंकि सब कुछ हमारे कर्मों का फल है, लेकिन मानवता को देखकर लगता है कि आज व्यक्ति कितना स्वार्थी हो गया है।ईश्वर में श्रद्धा कभी निष्फल नहीं जाती ।आप गीता पढ़िए जो किया है उसे भोगना जरूर पड़ेगा ।जब ईश्वर स्वयं इससे अछूते नहीं रहे तो हम तो इंसान हैं ।
वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़

 173.


दर्द ने पाला दर्द ने ही संभाला

दर्द ने मारा दर्द से ही दिल हारा
तोड़ तो देती है दुनिया ठोकरों से
मिलता यहाँ मुश्किलों से सहारा

 172.


 171.अजमेर से प्रकाशित आज 20 /10/20 के दैनिक आधुनिक राजस्थान में मेरी कविता...